Copyright उल्लंघन का केस कैसे फाइल करे

copyright infringement case को जिला या मूल अधिकार क्षेत्र वाले उच्च न्यायालय के समक्ष दायर किया जाना चाहिए।

Copyright infringement क्या है,आप Copyright का Case कैसे दर्ज़ कर सकते है। 

आईये समझते है की कॉपीराइट क्या है जब कोई भारत में कॉपीराइट का उल्लंघन करता है, तो उस कॉपीराइट के मालिक को ऐसे व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज करने और हर्जाने/मुआवजे के लिए मुकदमा करने का अधिकार होता है। 

कॉपीराइट के उल्लंघन का मतलब सरल शब्दों में किसी ऐसी सामग्री या कार्य की प्रतिलिपि बनाना (copy /duplicate) , पुनरुत्पादन (reproducing ) या उपयोग करना है जिसमें किसी अनधिकृत व्यक्ति द्वारा उसे अपना ओरिजिनल बता कर प्रस्तुत किया जाता है, जो आवश्यक परमिट या लाइसेंस लिए बिना ऐसे कंटेंट या work को खुद का बता कर उसका इस्तेमाल करते है।

भारत में कॉपीराइट एक अंतर्निहित inherent अधिकार है। सभी ओरिजिनल कार्यों का उस पर कॉपीराइट होता है और ऐसे कार्य का स्वामी ऐसे उल्लंघनकर्ता के खिलाफ उल्लंघन का मामला (copyright infringement case) दर्ज कर सकता है।

कौन से कार्य कॉपीराइट का विषय हो सकते हैं?

भारत में, निम्न विषयो से कॉपीराइट एक्ट का क्षेत्र उत्पन्न होता है जो ओरिजिनल वर्क की श्रेणी में आते है :

    • Musical works/ म्यूजिकल वर्क्स 
    • साहित्यिक कार्य जैसे पुस्तकों और पांडुलिपियों को लिखना  
    • सिनेमैटोग्राफी फिल्में,
    • फैशन डिजाइन,
    • Performances
    • सॉफ्टवेयर और अन्य कंप्यूटर प्रोग्राम और कंपाइलेशन , आदि।

कॉपीराइट का विषय क्या नहीं हो सकता है?

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि कॉपीराइट शीर्षकों (titles) , नामों (Names), विचारों, अवधारणाओं (Concept), नारों, विधियों और छोटे वाक्यांशों (short phrases) की रक्षा नहीं करता है। विचारों, प्रक्रियाओं, संचालन के तरीकों या गणितीय अवधारणाओं के लिए कोई कॉपीराइट सुरक्षा नहीं है।

भारत में कॉपीराइट प्रक्रिया

कॉपीराइट registration प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया का पालन करना होगा:

  • फॉर्म IV में सभी विवरणों और विवरणों में लिखित तथ्यों को एक आवेदन जिसे अपेक्षित शुल्क जमा करने (अधिनियम की अनुसूची 2 में उल्लिखित) के साथ रजिस्ट्रार को भेजा जाना चाहिए ।
  • प्रत्येक आवेदन पर आवेदक के साथ-साथ एक वकील द्वारा हस्ताक्षर किए जाने चाहिए, जिसके पक्ष में वकालतनामा या पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित की गई हो।
  • रजिस्ट्रार प्रासंगिक आवेदन के लिए एक डायरी नंबर जारी करता है।
  • इसके बाद आवेदक को किसी भी आपत्ति के प्राप्त होने के लिए 30 दिनों की अवधि तक प्रतीक्षा करनी होगी।
  • यदि 30 दिनों के भीतर कोई आपत्ति प्राप्त नहीं होती है, तो अधिकारी किसी भी विसंगति (discrepancy) के लिए आवेदन की जाँच करता है और यदि कोई विसंगति नहीं है, तो पंजीकरण किया जाता है। कॉपीराइट के रजिस्टर में काम की प्रविष्टि के लिए एक उद्धरण (reference)  रजिस्ट्रार को भेजा जाता है।
  • यदि कोई आपत्ति प्राप्त होती है तो परीक्षक आपत्तियों के संबंध में दोनों पक्षों को पत्र भेजकर उन दोनों की सुनवाई करेंगे। सुनवाई के बाद, यदि आपत्तियों का समाधान हो जाता है, तो अधिकारी/जांचकर्ता आवेदन की जांच करेगा और आवेदन को स्वीकृत या अस्वीकार कर देगा जैसा भी मामला हो।

कॉपीराइट उल्लंघन का मामला दर्ज करने की प्रक्रिया

भारतीय कॉपीराइट कानून 1957 की धारा -51 के अनुसार। कॉपीराइट के उल्लंघन के लिए सजा के 2 तरीके हैं:

  1. Civil उपचार
  2. आपराधिक कार्यवाही

1. कॉपीराइट उल्लंघन के Civil उपचार कॉपीराइट अधिनियम, 1957 की धारा 55 के अंतर्गत आते हैं।

इंटरलोक्यूटरी इंजेक्शंस: कॉपीराइट उल्लंघन के मामले में यह सबसे महत्वपूर्ण राहत है क्योंकि यह उल्लंघनकर्ता को आगे कुछ भी करने से रोकता है जो कॉपीराइट उल्लंघन के बराबर है। निम्नलिखित शर्तों को पूरा करने पर ही Interlocutory निषेधाज्ञा (Injunction ) दी जाती है:

    • प्रथम दृष्टया मामला होना चाहिए।
    • सुविधा का संतुलन होना चाहिए।
    • एक अपूरणीय चोट होनी चाहिए।

 वित्तीय राहत– कॉपीराइट अधिनियम की धारा 55 और धारा 58 के तहत, कॉपीराइट स्वामी 3 मामलों में वित्तीय राहत का दावा कर सकता है:

    • Account of profits जो मालिक को एक गैरकानूनी तरीके से कमाए हुए लाभ में यह अधिनियम के माध्यम से  ‘किए गए लाभ के बराबर लाभ प्राप्त करने ‘ का अवसर देता है।
    • Compensatory damages के कारण कॉपीराइट स्वामी को हुए नुकसान की भरपाई करता है।
    • उल्लंघनकारी लेख (infringing article) के मूल्य के अनुसार रूपांतरण क्षति (Conversion damages) की गणना की जाती है।

  एंटोन पिलर ऑर्डर– एंटोन पिलर ऑर्डर में निम्नलिखित तत्व मौजूद हैं:

    • यह कॉपीराइट के स्वामी और उसके वकील को प्रतिवादी के परिसरों की तलाशी लेने और उनकी सुरक्षित अभिरक्षा में सामान लेने की अनुमति देता है।
    • प्रतिवादी को माल को नष्ट करने या उसके गैरकानूनी उपयोग करने जैसे उल्लंघन को रोकने वाली  निषेधाज्ञा  (Injunction ) का उपचार भी मिलता है ।
    • एक आदेश जिसमें प्रतिवादी को उल्लंघन करने वाले सामान के आपूर्तिकर्ताओं और उपभोक्ता के नाम और पते का खुलासा करने का निर्देश दिया जाता है।

2. कॉपीराइट उल्लंघन के खिलाफ आपराधिक उपचार

कॉपीराइट के उल्लंघन का मुकदमा अधिकार क्षेत्र रखने वाले जिला न्यायालय या मूल अधिकार क्षेत्र वाले उच्च न्यायालय के समक्ष दायर किया जाना चाहिए। जिसके लिए सबसे पहले एक सूट न्यायालय में दर्ज़ करना होता है जिसे plaint या वाद भी कहा जाता है। CPC की धारा 26 से 35A तथा first schedule में ये बताया गया है की वाद / Plaint को किस तरह से न्यायालय के सामने रखना है।

 

वादपत्र  (Plaint) में निम्नलिखित में से किसी एक या अधिक के लिए प्रार्थना भी होनी चाहिए ताकि ये मालूम हो सके की Plaintiff न्यायालय से किस प्रकार की उपचार की अभिलाषा रखता है। 

 

1.वादी के अधिकारों की घोषणा की मांग ताकि कॉपीराइट कंटेंट में उसका हक़ स्थापित हो सके। 

2. स्थायी निषेधाज्ञा  (permanent injunction ) और मांगे गए निषेधाज्ञा की प्रकृति का वर्णन होना चाहिए। 

3. उपयोग की जाने वाली उल्लंघनकारी प्रतियों और प्लेटों की सुपुर्दगी। 

4. सूट की लागत।

 

कॉपीराइट के उल्लंघन के मुकदमे में वादी को निम्नलिखित बातों को स्थापित करना होता है:

    • वह धारा 54 के अर्थ के अंतर्गत कॉपीराइट का स्वामी है
    • प्रतिवादी द्वारा उल्लंघन किए जाने के समय उल्लंघन किए गए कार्य में कॉपीराइट मौजूद है।
    • उल्लंघन के विवरण की शिकायत की जानी चाहिए। 
    • क्षति की प्रकृति यदि जो उसे भुगतना पड़ा है या पीड़ित होने की संभावना है। 
    • प्रतिवादी ने क्या किया है या करने का प्रयास कर रहा है कॉपीराइट का उल्लंघन है।

कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के तहत कॉपीराइट उल्लंघन साबित होने की स्थिति में न्यायालय द्वारा निम्नलिखित कार्रवाई का आदेश दिया जा सकता है:

  • 3 साल तक की कैद लेकिन 6 महीने से कम नहीं।
  • कम से कम 50,000 रुपये का जुर्माना, जिसे 2,00,000 रुपये तक बढ़ाया जा सकता है।
  • उल्लंघन करने वाले सामानों की तलाशी और जब्ती।
    कॉपीराइट स्वामी को उल्लंघन करने वाले सामान की डिलीवरी।
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