गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है? Ganesh chaturthi 2021

Ganesh puja vidhi

गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है? Ganesh Chaturthi 2021, श्री गणेश पूजा विधि 

इस साल श्री गणेश चतुर्थी का त्यौहार 10 सितम्बर 2021 को पुरे भारत में धूम धाम से मनाया जायेगा। हलाकि कोरोना प्रोटोकॉल के तहत राज्यों को थोड़ा एहतियात करने का सुझाव दिया गया है। फिर भी लोगो के मन में उत्साह तो रहता ही है। आखिर उनके सबसे प्यारे प्रथमपूज्य भगवान के स्मरण और उनको घर में लाकर पूजने का समय जो आया है। 

श्री गणेश चतुर्थी का त्यौहार वैसे तो पुरे भारत में मनाया जाता है मगर महाराष्ट्र , कर्नाटक , गोवा , पश्चिम बंगाल , गुजरात में बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है। भगवान् गणेश को प्रथम पुजाय भी कहा जाता है। 

श्री गणेश को प्रथम पूज्य क्यों कहा जाता है ? 

एक लोकप्रिय किंवदंती के अनुसार भगवान गणेश की मां, देवी पार्वती ने उन्हें अपने  विश्राम कछ के द्वार की रक्षा करने के लिए कहा था। जब भगवान गणेश ने भगवान शिव को भी प्रवेश नहीं करने दिया, तो शिव जी ने क्रोधित होकर गणेश का सिर काट दिया। इस कृत्य से परेशान होकर, देवी पार्वती ने धमकी दी कि अगर उनके बेटे को वापस नहीं लाया गया तो वे दुनिया को नष्ट कर देंगे। इसलिए, भगवान शिव ने भगवान गणेश के सिर को हाथी के सिर से बदल दिया। उन्होंने आगे उन्हें दिव्यता प्रदान की और कहा कि सभी पूजा भगवान गणेश के नाम के आह्वान के साथ शुरू होगी।  इसलिए कभी भी कोई पूजा या शुभ कार्य करना हो तो श्री गणेश जी का नाम लेकर ही सुरु किया जाता है। 

दूसरी पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान गणेश और उनके बड़े भाई भगवान कार्तिकेय के बीच एक दौड़ हुई  थी। भगवान शिव और देवी पार्वती ने दोनों भाइयों को दुनिया का चक्कर लगाने के लिए कहा और जो पहले पुरे दुनिया का चक्कर पूरा करेगा वह विजेता होगा।

भगवान कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर असिन होकर तुरंत ही अपनी दौड़ शुरू करते हैं, यह सोचकर कि गणेश धीमा है और कभी भी पहले नहीं आ पाएंगे, लेकिन श्री गणेश जी थे बुद्धि और ज्ञान के भंडार ,गणेश जी ने अपने माता-पिता के पास जाकर कहा कि वे ही वास्तव में उनके लिए दुनिया है और उन्होंने अपने माता पिता के चक्कर लगा लिए जिससे उनकी परिक्रमा पूरी हो गयी, उन्हें विजेता घोसित किया गया। माता-पिता के प्रति उनके प्रेम और दौड़ जीतने में बुद्धि से प्रभावित होकर, भगवान शिव और देवी पार्वती ने भगवान गणेश को अमरता के साथ ज्ञान के फल का आशीर्वाद दिया।

गणेश चतुर्थी में भक्त क्या करते है ?

विनायक चतुर्थी जिसे हम आमतौरपर गणेश चतुर्थी के नाम से जानते है,यह त्योहार ज्ञान और समृद्धि के देवता भगवान गणेश के जन्म का प्रतीक है। यह हिंदू कैलेंडर के भाद्रपद महीने में आता है, जो अगस्त-सितंबर में पड़ता है। भक्त भगवान गणेश जी की मूर्तियों को अपने अपने घर में लाकर उनका विधि पूर्वक प्राण प्रतिष्ठा करके उनका अवाहन करते है , महाराष्ट्र , कर्नाटक जैसे राज्यों में लोग बाप्पा मोरया को 10 दिनों तक अपने घर में रखकर  उनकी सेवा करते है। वक्रतुंड महाराज की प्रिय भोग जिसे मोदक कहते है उनका भोग लगाया जाता है।  लोग अपने अपने घरो की सजवाट करते है और पुरे उमंग के साथ गजानन महाराज की पूजा अर्चना की जाती है। 

घर में मेहमानो का आना जाना होता है , लोग जरूरतमंद लोगो को प्रसाद और मोदक का भोग जो श्री गणेश जी को लगाया जाता है उसका वितरण करते है।  

पूजा का समय:

इस वर्ष 10 सितम्बर को चतुर्थी सुबह 12:17 बजे से रात 10 बजे तक चलेगी। पूजा विधि का समय सुबह 11:03 बजे से शुरू होकर दोपहर 1:33 बजे तक चलेगा। भक्त इस दिन भगवान  श्री गणेश से प्रार्थना करते हैं, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि उनकी पूजा करने से किसी के जीवन से बाधाएं दूर होती हैं और शांति मिलती है।

गणेश चतुर्थी पूजा विधि 2021


पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ मुख करके बैठकर पूजा प्रारंभ करें. इन तीन मंत्रो का जाप कर आचमन करे ॐ केशवाय नम: ॐ नारायणाय नम: ॐ माधवाय नम: और उसके बाद भगवान गणेश को मूलमंत्र श्री गणेशाय नमः। ऊँ गं गणपतये नमः का जप करते हुए पूजन सामग्री जैसे पुष्प, धूप, दीप, कपूर, रोली, मौली लाल चंदन, मोदक आदि चढ़ाएं. गणेश जी को सूखा सिंदूर का तिलक लगाएं ,फिर दक्षिणा चढ़ाकर भगवान गणेश जी की आरती करें। फिर परिक्रमा करें! तत्पश्चात भगवान गणेश-अम्बिका से प्रार्थना करें!

गणेश चतुर्थी व्रत पूजा सामग्री

गणेश जी की स्‍थापना से पहले पूजा की सारी सामग्री एकत्रित कर लें। पूजा के लिए चौकी, लाल कपड़ा, गणेश प्रतिमा, जल कलश, पंचामृत, लाल कपड़ा, रोली, अक्षत, कलावा, जनेऊ, गंगाजल, इलाइची-लौंग, सुपारी, चांदी का वर्क, नारियल, सुपारी, पंचमेवा, घी-कपूर की व्‍यवस्‍था कर लें। लेक‍िन ध्‍यान रखें क‍ि श्री गणेश को तुलसी दल व तुलसी पत्र नहीं चढ़ाना चाहिए। इसके जगह पर गणपत‍ि बप्‍पा को शुद्ध स्‍थान से चुनी हुई दूर्वा जि‍से कि अच्‍छे तरीके से धो ल‍िया हो, अर्पित करें।

गणेश चतुर्थी व्रत कथा

एक बार महादेव (शिवजी) पार्वती के साथ नर्मदा नदी के तट पर गए। वहाँ एक सुंदर स्थान पर पार्वती जी ने महादेव जी के साथ चौपड़ खेलने की इच्छा व्यक्त की। तभी शिवजी ने पूछा – हमारे इस खेल मे किसकी हार एवं जीत हुई उसका साक्षी कौन होगा ? पार्वती जी ने तत्काल वहाँ की घास के तिनको को बटोरकर एक पुतला बनाया और उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करके उससे कहा- बेटा! हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, किन्तु यहाँ पर हमारी खेल के हार-जीत का साक्षी कोई नहीं है। अतः खेल के अन्त में तुम हमारी हार-जीत के साक्षी होकर बताना कि हममें से कौन जीता, कौन हारा?

खेल आरंभ हुआ के पश्चात देवयोग से तीनों बार पार्वती जी ही जीतीं। जब अंत में बालक से हार-जीत का निर्णय कराया गया तो उसने महादेव जी को विजयी बताया। परिणामतः पार्वतीजी ने क्रोधित होकर उसे एक पाँव से लंगड़ा होने और वहाँ के कीचड़ में पड़ा रहकर दुःख भोगने का श्राप दे दिया।

बालक ने विनम्रतापूर्वक कहा- माँ! मुझसे अज्ञानतावस ऐसा हो गया हैएवं  मैंने किसी कुटिलता या मन मे द्वेष के कारण ऐसा नहीं किया। मुझे क्षमा करें तथा श्राप से मुक्ति का उपाय बताएँ। तब ममतारूपी माँ को उस पर दया आ गई और वे बोलीं- यहाँ नाग-कन्याएँ गणेश-पूजन करने के लिएआएँगी। उनके उपदेश से तुम गणेश व्रत करके मुझे प्राप्त करोगे। इतना कहकर वे कैलाश पर्वत चली गईं।

एक वर्ष प्रश्चात वहाँ श्रावण के महीने मै नाग-कन्याएँ गणेश पूजन के लिए आईं। नाग-कन्याओं ने गणेशजी का व्रत करके उस बालक को भी व्रत की विधि बताई। तत्पश्चात बालक ने 12 दिन तक श्रीगणेशजी का व्रत किया। तब गणेशजी ने उसे दर्शन देकर कहा- मैं तुम्हारे व्रत से प्रसन्न हूँ। तुम मुझसे मनोवांछित वर माँगो। बालक बोला- भगवन! मेरे पाँव में इतनी शक्ति दे दो कि मैं कैलाश पर्वत पर अपने माता-पिता के पास जा सकूं एवं वे मुझसे  प्रसन्न हो जाएँ।

गणेशजी ‘तथास्तु’ कहकर अंतर्धान हो गए। बालक भगवान शिव के चरणों में पहुँच गया। शिवजी उसे वहाँ पाकर अस्चर्य होकर उस्से वहाँ तक  पहुँचने के साधन के बारे में पूछा।

तब बालक ने सारी कथा शिवजी को सुना दी। उधर उसी दिन से ही किसी कारण वश अप्रसन्न होकर पार्वती जी शिवजी से भी विमुख हो गई थीं। तदुपरांत भगवान शंकर ने भी बालक की तरह 21 दिन पर्यन्त श्रीगणेश जी का व्रत किया, जिसके प्रभाव से पार्वती जी के मन में स्वयं महादेवजी से मिलने की इच्छा जाग्रत हो गयी।

वे शीघ्र ही कैलाश पर्वत पर आ पहुँची। वहाँ पहुँचकर उन्होंने शिवजी से पूछा- की “भगवन” आपने ऐसा कौन-सा उपाय किया जिसके फलस्वरूप मैं आपके पास भागी-भागी आ पहुंची हूँ। शिवजी ने ‘गणेश व्रत’ का इतिहास उनसे कह दिया।

तब पार्वती जी ने अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा से 21 दिन पर्यन्त 21-21 की संख्या में दूर्वा, पुष्प तथा लड्डुओं से गणेशजी का पूजन किया। 21वें दिन कार्तिकेय स्वयं ही पार्वती जी से आ मिले। उन्होंने भी माँ के मुख से इस व्रत का माहात्म्य सुनकर व्रत किया।

विघ्नहर्ता श्री गणेश को मनाना है तो पढ़ें ये 5 मँत्र 

  • ॐ  गं गणपतये नमः
  • ॐ श्री विघ्नेश्वार्य नम:
  • ॐ श्री गणेशाय नम:
  • ॐ निर्हन्याय नमः
  • ॐ अविनाय नमः
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