Freedom fighter Jatindra Nath Das, hunger strike 1929.

Freedom fighter Jatindra Nath Das, hunger strike 1929.

 

Freedom fighter Jatindra Nath Das, hunger strike 1929.

 

जतिंद्र नाथ दास का जन्म 1904 में कलकत्ता में एक मौलिका कायस्थ परिवार में हुआ था। वह कम उम्र में ही बंगाल में एक क्रांतिकारी समूह अनुशीलन समिति में शामिल हो गए और 1921 में गांधी के असहयोग आंदोलन में भी भाग लिया। आज 13 सितम्बर को उनकी पुण्यतिथि है।  उनको हंगर स्ट्राइक आंदोलन के लिए जाना जाता है। जहाँ उन्होंने 63 दिनों तक कुछ भी नहीं खाकर अँगरेज़ सरकार के खिलाफ अपना विरोध प्रदर्शन लाहौर जेल में किया था।  सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें ने एक बार उनकी तुलना करते हुए कहा की दास देश के ‘युवा दधीची‘ थे, उन्होने दास की तुलना प्राचीन भारतीय ऋषि दधीची से की, जो एक नेक काम के लिए अपनी जान दे देते हैं।

Jatindra nath Das

 

Jatindra nath das एक  मेधावी छात्र थे और उन्होंने मैट्रिक और इंटरमीडिएट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। वह बंगाल में एक क्रांतिकारी समूह “अनुशीलन समिति “में शामिल हो गए, और 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भी केवल 17 साल की उम्र में भाग लिया।

 

नवंबर 1925 में, कलकत्ता के बंगबासी कॉलेज में बीए की पढ़ाई के दौरान, दास को उनकी राजनीतिक गतिविधियों के लिए गिरफ्तार किया गया और उन्हें मयमनसिंह सेंट्रल जेल में कैद कर दिया गया। वहां नजरबंद रहने के दौरान, वह राजनीतिक बंदियों के साथ हुए दुर्व्यवहार के विरोध में भूख हड़ताल पर चले गए।

 

बीस दिनों के उपवास के बाद, जेल अधीक्षक ने माफी मांगी और उन्होंने उपवास छोड़ दिया। भारत के अन्य हिस्सों में कार्यरत क्रांतिकारियों ने उनसे संपर्क किया ताकि वे भगत सिंह और साथियों के लिए बम बनाने में भाग लेने के लिए सहमतहो सके। सचिंद्र नाथ सान्याल ने उन्हें बम बनाना सिखाया भी था। 

 

Hunger strike/ भूख हड़ताल

 

14 जून 1929 को उन्हें क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए गिरफ्तार कर लिया गया और लाहौर जेल में supplementary Lahore Conspiracy Case लाहौर षडयंत्र मामले के तहत मुकदमा चलाने के लिए कैद कर लिया गया।

 

लाहौर की जेल में, दास ने अन्य क्रांतिकारी सेनानियों के साथ भूख हड़ताल की शुरुवात की, जिसमें यूरोप के लोगों के साथ भारतीय राजनीतिक कैदियों के लिए समानता की मांग की गई थी।  जेलों में रहने वाले भारतीय कैदियों की स्थिति दयनीय थी। जेल में भारतीय कैदियों को जिन कपड़ो को पहनने के लिए दिया जाता था , उन्हें कई दिनों तक नहीं धोया जाता था, और चूहे और तिलचट्टे रसोई क्षेत्र में घूमते रहते थे जिससे भोजन खाने के लिए असुरक्षित हो जाता था। भारतीय कैदियों को न तो किसी भी प्रकार की पठन पठान की सामग्री जैसे समाचार पत्र, और न ही लिखने के लिए कागज ही उपलब्ध कराया जाता था। एक ही जेल में बंद ब्रिटिश कैदियों की स्थिति आश्चर्यजनक रूप से भिन्न थी।

 

दास की भूख हड़ताल 13 जुलाई 1929 को शुरू हुई और 63 दिनों तक चली। जेल प्राधिकरण ने उसे और दूसरे स्वतंत्रता कार्यकर्ता को जबरन खिलाने के उपाय किए। आखिरकार, जेल समिति ने उनकी बिना शर्त रिहाई की सिफारिश की, लेकिन सरकार ने इस सुझाव को खारिज कर दिया और उन्हें जमानत पर रिहा करने की पेशकश की।

 

13 सितंबर 1929 को जतिंद्र नाथ दास की मृत्यु हो गई थी । दुर्गा भाभी ने उनके अंतिम संस्कार जुलूस का नेतृत्व किया था , जो ट्रेन से लाहौर से कलकत्ता लाय गए थे । दास को श्रद्धांजलि देने के लिए हजारों लोग रेलवे स्टेशनों पर पहुंचे। कलकत्ता में दो मील लंबा जुलूस ताबूत को श्मशान घाट तक ले गए। 

 

सुभाष चंद्र बोस ने , जिन्होंने हावड़ा रेलवे स्टेशन पर दास का ताबूत प्राप्त किया था और अंतिम संस्कार के जुलूस को श्मशान घाट तक ले गए ने कहा था की । जेल में जतिन दास की भूख हड़ताल अवैध बंदी के खिलाफ प्रतिरोध का एक महत्वपूर्ण क्षण बनेगा। 

 

देश के लगभग हर नेता ने उस वक़्त Jatindra Nath Das को श्रद्धांजलि दी। मोहम्मद आलम और गोपी चंद भार्गव ने विरोध में पंजाब विधान परिषद से इस्तीफा दे दिया। मोतीलाल नेहरू ने लाहौर में  कैदियों की अमानवीयता के खिलाफ केंद्रीय विधानसभा को स्थगित करने का प्रस्ताव रखा। इस निंदा प्रस्ताव को केंद्रीय विधानसभा में 47 के मुकाबले 55 मतों से पारित किया गया था।

 

जवाहरलाल नेहरू ने उस वक़्त कहा की , “भारतीय शहीदों के लंबे और शानदार किरदार के लिए एक और नाम जोड़ा गया है। आइए हम अपने सिर को झुकाएं और संघर्ष को जारी रखने के लिए कार्य करने की शक्ति के लिए प्रार्थना करें, चाहे वह कितना भी लंबा हो। यह भी हो सकता है की परिणाम कुछ भी हो, जब तक जीत हमारी है ”हमे स्वतंत्रता के लिए लड़ते रहना होगा। 

 

सुभाष चंद्र बोस ने दास को “भारत के युवा दधीची” के रूप में वर्णित किया, प्रसिद्ध पौराणिक योगी दधीची का जिक्र करते हुए जिन्होंने एक राक्षस को मारने के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था।

 

दुनिया में बहुत कम लोग होंगे जो इतनी कम उम्र में राजनीतिक बंदियों के लिए इतना बड़ा काम कर पाए हो। इसलिए यह इस साहसी स्वतंत्रता सेनानी और प्रतिबद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता की स्मृति में उनकी पुण्यतिथि – 13 सितंबर – को न केवल भारत  बल्कि पूरे विश्व के राजनीतिक कैदियों के लिए न्याय दिवस के रूप में मनाने के लिए एक उपयुक्त श्रद्धांजलि होगी।

 

 

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