Durga Puja 2021, Navratra Kab Hai ? घट स्थापना 2021

शारदीय नवरात्र की शुरुआत आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है, इस बार नवरात्र 7 अक्टूबर 2021 गुरुवार से प्रारंभ होने जा रहा है। इस साल 2021 में 7 अक्टूबर को घट स्थापना का शुभ मुहूर्त है जो कि सुबह 6:17 से प्रारंभ होकर सुबह 7:07 तक है।

 

शरद काल में मनाई जाने वाली दुर्गा पूजा बंगाल के त्योहारों के कैलेंडर का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक उत्सव है। दुर्गा पूजा यह केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं बल्कि बिहार, उड़ीसा ,असम ,झारखंड सहित भारत के अन्य राज्यों में बड़े ही धूम धाम से मनाई जाती है। विशेषकर जहां बंगाली समुदाय के लोग रहते हैं वे दुर्गा पूजा का त्यौहार बड़े ही धूमधाम से मनाते है।

 

 

 

जैसा कि आप जानते ही होंगे कि यह त्यौहार दुर्गा देवी से आशीर्वाद पाने के लिए उन्हें पूजने और महिषासुर राक्षस पर उनकी विजय को मनाने के लिए मनाया जाता है। पौराणिक धर्म ग्रंथों और ऋषि मुनियों के वचनों से भी जाना जाता है कि भगवान राम ने रावण से युद्ध करने से पहले दुर्गा देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनकी पूजा की थी।

 

दुर्गा पूजा अधिकतर समय में अक्टूबर माह पर प्रारंभ होता है यह 10 दिनों का त्यौहार होता है जोकि महालया की दिन से शुरू होता है। इस बार महालया  6 अक्टूबर 2021 को मनाया जायेगा। 

 

 

महालया जिसे आगमोनी भी कहते है, का आगमन गीत गाकर मनाया जाता है।  बंगाली समुदाय के लोग इस दिन रेडियो पर वीरेंद्र भद्र जी का फेमस महालया संगीत सुनने के लिए सुबह जल्दी उठ जाते हैं और महालया के आगमन के गीत का संगीत सुनते हैं।

 

 

असल में इस गीत के माध्यम से बंगाल के समुदाय के लोग मां दुर्गा को आगमन या आवाहन करते हैं और उन्हें अपने घर पर बुलाते हैं। 

 

कब से शुरू होता है दुर्गा पूजा ?

 

 

दुर्गा पूजा का त्यौहार बंगाल में खासकर महालया के 5 दिन बाद आरंभ होता है जिसमें मुख्यतः महा सष्ठी ,महासप्तमी ,महाअष्टमी, महानवमी और दशमी के दिन मां दुर्गा की पूजा की जाती है। वैसे तो पूरे भारत में शारदीय नवरात्र 9 दिनों का मनाया जाता है जिसकी शुरुआत कलश स्थापना के साथ की जाती है।

 

 

शारदीय नवरात्र की शुरुआत आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है। 

 

दुर्गा पूजा कलश स्थापना 2021 कब है?

 

जैसा कि आप जानते हैं कि 9 दिन की शारदीय नवरात्री की शुरुआत प्रथम दिन कलश स्थापना के साथ होती है जिसे घटस्थापना भी कहते हैं । घट स्थापना के लिए एक खास दिन और खास मुहूर्त का चयन किया जाता है इस साल 2021 में 7 अक्टूबर को घट स्थापना का शुभ मुहूर्त है जो कि सुबह 6:17 से प्रारंभ होकर सुबह 7:07 तक है। 

 

 

नवरात्रि 2021 आरंभ और अंत।



नवरात्रि प्रारंभ: 7 अक्टूबर 2021 गुरुवार

नवरात्रि नवमी तिथि: 14 अक्टूबर 2021 गुरुवार

नवरात्रि दशमी तिथि: 15 अक्टूबर 2021 शुक्रवार

नवरात्रि घट स्थापना तिथि: 7 अक्टूबर 2021 गुरुवार

 

देवी के नौ रूपों की पूजा

 

  • नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के पहले स्वरूप माता शैलपुत्री की पूजा होती है।

 

  • द्वितीया तिथि 8 अक्टूबर 2021 शुक्रवार को मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होगी।

 

  • तृतीया तिथि 9 अक्टूबर 2021 शनिवार को मां चंद्रघंटा की पूजा मनाई जाएगी।

 

  • चतुर्थी तिथि 9 अक्टूबर 2021 माता के चौथे स्वरूप कुष्मांडा देवी की पूजा की जाएगी।

 

  • पंचमी तिथि 10 अक्टूबर 2021 रविवार को माता स्कंदमाता की पूजा की जाएगी।

 

  • षष्ठी तिथि 11 अक्टूबर 2021 सोमवार को मां कात्यायनी की पूजा की जाएगी।

 

  • सप्तमी तिथि 12 अक्टूबर 2021 को मंगलवार के दिन मां कालरात्रि की पूजा धूमधाम से की जाएगी।

 

  • अष्टमी तिथि 13 अक्टूबर 2021 को बुधवार महागौरी माता की पूजा की जाएगी।

 

  • नवमी तिथि 14 अक्टूबर 2021 गुरुवार को मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।

 

  • दशमी तिथि 15 अक्टूबर 2021 शुक्रवार को शारदीय नवरात्र का पारण और मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन करके विजयादशमी मनाई जाएगी।

 

वह कौन सी प्रमुख कारण था जिसके वजह से दुर्गा पूजा बंगाल का सबसे बड़ा पर्व बन गया ?

 

शारदीय नवरात्र का त्यौहार देश में दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है इसमें हर इलाके की अपनी संस्कृति और विशेषताएं जुड़ी होती है चाहे आप कर्नाटक के मैसूर के जंबूसावरी दशहरे की बात करें या कुल्लू मनाली की दशहरे की यह गुजरात के बहुचर्चित गरबा नृत्य के बारे में हो इस त्यौहार का अलग ही रंग होता है और यह हर एक जगह की अपनी सांस्कृतिक विरासत को और उससे जुड़ी विशेषताओं को दर्शाता है।

 

परंतु पश्चिम बंगाल का दशहरा इन सबसे अलग है 10 दिनों तक चलने वाले इस त्यौहार के दौरान वहां का पूरा माहौल मां दुर्गा के रंग में रंग जाता है जैसा कि आप जानते हैं कि बंगाली समुदाय के लोगों के लिए मां दुर्गा और मां काली की आराधना से बड़ा कोई उत्सव नहीं होता चाहे बंगाली समुदाय के लोग देश में हो या विदेश में हो,इस दिन दुर्गा पूजा मनाने के लिए अपने घर वापस लौटते हैं और अगर किसी कारण से घर लौट ना पाए तो वे जहां जिस स्थान पर निवास करते हैं उसी स्थान पर दुर्गा पूजा और काली पूजा का त्यौहार बहुत ही धूमधाम से मनाते हैं।

 

भारत में दुर्गा पूजा का त्यौहार बहुत पुराना है ऐसा माना जाता है की 17वीं और 18वीं सदी में जमींदार और अनेक लोग बहुत ही बड़े स्तर पर अपने घर पर दुर्गा पूजा का आयोजन करते थे जहां सभी लोग एक छत के नीचे देवी दुर्गा का पूजा करते थे और परिवार के सभी लोग उस पूजा में सम्मिलित होते थे जिसका एक उदाहरण है कोलकाता का आचला पूजा काफी प्रसिद्ध है जिसकी शुरुआत 1610 मैं जमींदार लक्ष्मीकांत मजूमदार ने कोलकाता की शोभा बाजार छोटो राजबाड़ी के 33 राजा नबाकृष्ण रोड से की थी जो मुख्य रूप से 1757 में शुरू हुआ इसके बाद से ही बंगाल के बाहर भी पंडालों में देवी दुर्गा की प्रतिमा की स्थापना कर भव्य तरीके से पूजा की जाने लगी।

 

दुर्गा पूजा की ख्याति को ब्रिटिश राज में और भी अधिक पहचान मिली उस वक्त हिंदू सुधारको ने  दुर्गा पूजा को भारत में पहचान दिलाई और इसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक भी बनाया।

 

दुर्गा पूजा और कोलकाता के पाड़ा पूजो की महत्व 

 

जैसा कि आप जानते हैं कोलकाता की दुर्गा पूजा पूरे भारत में प्रसिद्ध है यहां पर इस पूजा को पूरे परंपरागत तरीके से मनाया जाता है।  लेकिन कोलकाता में इस पूजा की अपनी ही खासियत होती है और यह इतना मनमोहक होता है कि इन 5 दिनों में आप दुर्गा पूजा के रंग में रंग जाएंगे।

 

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की खासियत यह होती है कि इस दुर्गा पूजा को 2 तरीके से मनाया जाता है खासकर कोलकाता में दुर्गा पूजा दो तरीके से मनता है जिसमे एक होता है पाड़ा का पूजा और दूसरा होता है बड़ीर पूजा , यहां पाड़ा से मतलब वह स्थान जहां पर बहुत सारे परिवार के लोग एक साथ रहते हैं जिसे हिंदी में मोहल्ला या टोला कहा जाता है और बाड़ी से मतलब घर होता है जो एक परिवार का घर होता है। अपने घर पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करते हैं और उनकी पूजा करते हैं जिसे बाड़ीर पूजा कहा जाता है।

 

  1. पारा या पाड़ा दुर्गा पूजा- पारा दुर्गा पूजा यानी स्थानीय दुर्गा पूजा जो सामान्यतः पंडालों और कम्युनिटी हॉल में होती है इसमें खासकर रोशनी डिजाइन थीम बेस्ड और ढेर सारे  सांस्कृतिक समारोह का आयोजन किया जाता है जिसमें उस स्थान की सभी लोग सम्मिलित होते हैं और मिलजुलकर दुर्गा पूजा का आयोजन करते हैं।

 

2. बारिर दुर्गा पूजा-उत्तरी कोलकाता दक्षिणी कोलकाता में बाड़ी दुर्गा पूजा मनाने की परंपरा रही है जैसा कि मैंने पहले ही बताया बाड़ी का मतलब घर होता है और इस पूजा में एक घर की सभी सदस्य मिलकर एक साथ इस पूजा को मनाते हैं ज्यादातर देखा गया है कि यह पूजा समृद्ध परिवार वाले मनाते थे और अभी भी मनाते आ रहे हैं।

 

दुर्गा पूजा पर्व हिंदू देवी दुर्गा की बुराई के प्रतीक राक्षस महिषासुर पर विजय के रूप में मनाया जाता है इसलिए दुर्गा पूजा का पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में जाना जाता है।

 

कोलकाता में दुर्गा पूजा की खास विशेषता यह होती है कि यहां पर बहुत ही आकर्षक पंडालों का निर्माण किया जाता है। दुर्गा पूजा पंडालों में मां दुर्गा की प्रतिमा महिषासुर के वध करते हुए दिखाई जाती है साथ में इसमें अन्य देवी देवताओं की प्रतिमा भी रहती है जिसमें मुख्य रूप से श्री गणेश कार्तिकेय सरस्वती और मां लक्ष्मी की प्रतिमा रहती है महादेवी के साथ उनका वाहन शेर भी होता है। साथ में शिव जी की प्रतिमा का भी वर्णन रहता है।

 

चोख दान और संध्या आरती 

 

कोलकाता में दुर्गा पूजा की परंपरा बहुत ही प्रचलित है चोखदान के दौरान दुर्गा मां को प्रतीकात्मक आंखों का चढ़ावा दिया जाता है ,चाला बनाने में 3 से 4 महीने का समय लगता है और इन सबके अंत में मां दुर्गा की आंखों को बनाया जाता है इसी परंपरा को चोखूदान कहा जाता है।

 

संध्या आरती 

बंगाल में दुर्गा पूजा का सबसे बड़ा आकर्षण का केंद्र संध्या आरती होता है संध्या आरती का इस दौरान बहुत ही खास महत्व रहता है। कोलकाता का संध्या आरती की रौनक इतनी चमकदार और खूबसूरत होती है कि आप इस पर विश्वास ही नहीं कर सकते हैं। सभी लोग बंगाली पारंपरिक परिधानों से सज धज कर मां दुर्गा की प्रतिमा के सामने ढाक के ताल पर आरती करते हैं और विशेषकर जो पुजारी होते हैं वह भी ढाक के ताल पर नाच कर मां दुर्गा की आरती करते हैं जो कि देखने लायक होता है।

इस नृत्य को धुनुची नाच भी कहते हैं, इस नृत्य के माध्यम से मां भवानी की शक्ति और ऊर्जा को बढ़ाने के लिए किया जाता है इसमें खासकर कुछ विशेष प्रकार की हवन सामग्री रखी जाती है और जिसके माध्यम से मां दुर्गा की आरती उतारी जाती है। धुनुची नाच सप्तमी से शुरू होता है और अष्टमी नवमी तक चलता है।

 

दुर्गा पूजा का पौराणिक महत्व

दुर्गा पूजा केवल सांस्कृतिक उत्सव ही नहीं है इस पूजा का एक पौराणिक महत्त्व भी है उन कथाओं के अनुसार इस त्यौहार को देवी दुर्गा और राक्षस महिषासुर के बीच युद्ध के पश्चात मां दुर्गा के विजय स्वरूप के रूप में मनाया जाता है जिस कारण इसका नाम विजयादशमी भी है। ऐसा माना जाता है की महिषासुर का वध करने के पश्चात दशमी तिथि को ही उस राक्षस का वध हो गया था जिसकी प्रतीक स्वरूप विजयदशमी का त्यौहार मनाया जाता है।

 

कुमारी पूजा

दुर्गा पूजा के दौरान देश में और पश्चिम बंगाल में देवी के नौ रूपों को पूजा जाता है परंतु इनमें सबसे प्रचलित है कुमारी पूजा इस दौरान देवी के सामने 1 से 16 वर्ष की लड़कियों का चयन किया जाता है और उन्हें पूजा जाता है और उनकी आरती उतारी जाती है कुमारी पूजा का बहुत ही महत्व दुर्गा पूजा के दौरान माना जाता है।

 

सिंदूर खेला 

दशमी तिथि के आखरी दिन जिस दिन मां दुर्गा को विदाई दी जाती है उस दिन बंगाली समुदाय की महिलाएं पारंपरिक लाल सफेद साड़ी पहनकर सिंदूर खेला करती है इसमें भी एक दूसरे के साथ सिंदूर से रंग लगाकर सिंदूर खेला का आयोजन करती है और इसी के साथ ही इस त्यौहार का अंत होता है।

 

संधी पूजा

 शारदीय नवरात्र के दुर्गा पूजा के अवसर पर 1 दिन बहुत ही महत्त्व रखता है जिस दिन को महा अष्टमी की पूजा की जाती है यह दिन दुर्गा पूजा के लिए मुख्य दिन माना जाता है, महा अष्टमी पर संधि पूजा होती है। संधी पूजा को अष्टमी और नवमी तिथि के दिन के बीच में मनाया जाता है।

 

मां दुर्गा कि कुछ मंत्र जिनका आवाहन माता के पूजा के समय किया जाता है। ओम जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।

 

 

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